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बीएचयू में फिर आगजनी , पथराव ,लाठीचार्ज

बीएचयू हिंसा : बीती रात की हिंसक घटनाओं. के बाद परिसर शांति बहाली की ओर बढ ही रहा था कि अचानक परिसर का  माहौल एकाएक गर्म हो गया ,दोपहर 12 बज...

बीएचयू हिंसा : बीती रात की हिंसक घटनाओं. के बाद परिसर शांति बहाली की ओर बढ ही रहा था कि अचानक परिसर का  माहौल एकाएक गर्म हो गया ,दोपहर 12 बजे ब्रोचा छात्रावास के सामने से गुजर रहे ट्रेक्टर में आग लगा दी गई वहीं एलडी गेस्ट हाउस चौराहे पर शांति मार्ग निकाल रही छात्राओं पर प्राक्टोरियल बोर्ड के सुरक्षाकर्मियों ने लाठीचार्ज कर दिया । लाठीचार्ज में आधा दर्जन छात्राओं के घायल होने की सूचना है । इसके बाद त्रिवेणी छात्रावास के पास आन्दोलनकारियों ने जमकर पथराव किया । मौके पर पहुंचे सुरक्षाकर्मियों ने लाठी पटककर आन्दोलनकारियों को तितर - बितर कर दिया ....


गौरतलब है कि बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की कुछ छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटना के बाद भी प्रशासन ने जब कोई कार्रवाई नहीं की तो वहां की छात्राओं ने सड़क पर उतरने की ठानी। पिछले दो दिन से आन्‍दोलन को तोड़ने की तमाम कोशिशों के बावजुद छात्राएं डटी हुई हैं। उनके हॉस्‍टलों पर ताले लगा दिये गये हैं, चारों तरफ पुलिस, आरएएफ बिठा दी गयी है पर फिर भी उनके हौंसले बुलंद हैं। इसी दौरान बीएचयू में मोदी का भी दौरा था। इसी का बहाना बनाकर तमाम संघी इस आन्‍दोलन को बदनाम करने में जुट गये हैं।
बीएचयू की छात्राओं द्वारा यौन अपराधियों के खिलाफ आंदोलन को एबीवीपी जब मोदी विरोधी आंदोलन बताता है तो वह यह सच्चाई ही बयान कर रहा होता है कि मोदी-योगी, आदि की संघी सरकारें खुद को पितृसत्ता से लेकर तमाम प्रतिक्रियावादी विचारों के वाहक ब्राह्मणवादी विचार के लम्पटों-लुच्चों का संरक्षक मानती हैं; और उनके विरोध को अपना विरोध|यही वजह है कि बीएचयू का वाइस चांसलर पूरी बेशर्मी और प्रशासनिक ताकत के साथ लम्पटों, अपराधियों के साथ खड़ा है, अपराध की शिकार छात्रा के साथ झूठी हमदर्दी तक व्यक्त करने को तैयार नहीं है बल्कि उसे ही अपराध के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है, और विरोध में बहादुरी से डटीं छात्राओं (और छात्रों) पर हर तरह के दबाव-डराने-धमकाने के साथ ही दमन की भी तैयारी है| हॉस्टलों पर ताले लगा दिए गए हैं, पीने के पानी के नल और शौचालय पर ताला लगा दिया गया है| साफ है कि कि ये हिन्दुत्वी लम्पट भी भारतीय विश्वविद्यालयों का वही हाल करना चाहते हैं जो ईरानी कठमुल्लाओं ने तेहरान और तालिबानियों ने काबुल विवि का किया था| पर हैदराबाद, दिल्ली, जेएनयू, मद्रास आईआईटी, जादवपुर, पंजाब (चंडीगढ़) से बीएचयू तक छात्र भी बता रहे हैं कि ऐसा नहीं होने दिया जायेगा|बी.एच.यू की बहनो, साथियो! तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं!!बी.एच.यू. प्रशासन मुर्दाबाद! पूँजीवादी पितृसत्ता का नाश हो!बहरी सरकार के कानों में आवाज़ पहुँचाने के लिए अपनी आवाज़ और ऊँचा करो!
देह नहीं होती है एक दिन स्त्री और उलट-पुलट जाती है सारी दुनिया अचानक!-कात्यायनी बी.एच.यू. में एक छात्रा के साथ छेड़खानी की घटना के बाद बी.एच.यू की छात्राओं ने जिस तरह से जुझारू संगठित प्रतिरोध को जन्म दिया है वो एक मिसाल है। *यह प्रतिरोध चढ्ढीधारी कुलपति और उसकी सरपरस्ती में पलने वाले लम्पटों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो छात्राओं के साथ होने वाली बदसलूकियों के लिए छात्राओं को ही ''संस्कार'' और ''चरित्र'' का पाठ पढ़ाते हैं।वास्तव में छात्राओं का फूट पड़ा ये आक्रोश गुण्डागर्दी-लम्पटई व प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ़ अरसे से इकट्ठा हुये गुस्से की अभिव्यक्ति है। बी.एच.यू. में यौन हिंसा और महिला विरोधी अपराधों को आलम यह है कि एक लड़की का रेप होता है और प्रशासन अपराधियों पर कार्यवाही करने के बजाय लड़की को ही मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर देता है। जब 'नवीन गर्ल्स हॉस्टल' की लड़कियाँ हॉस्टल की खिड़कियों के सामने खड़े लम्पट लड़कों की गन्दी हरकतों की शिकायत करती हैं तो वार्डन महोदया कहती हैं कि खिड़कियाँ बन्द कर लो। एक अन्य शिकायत पर प्रॉक्टोरियल बोर्ड का एक कर्मचारी छात्रा से कहता है कि-'आप हॉस्टल जायेंगी या रेप होने का इंतजार करेंगी।'
अब जब छात्राओं ने आन्दोलन का रास्ता पकड़ा तो सनातनी मूल्यों का ठेकेदार बना बी.एच.यू प्रशासन, वी.सी. के नेतृत्व में प्रॉक्टोरियल बोर्ड, मनुवादी छात्रों का गुण्डा गिरोह, सत्ता के तलवाचाट अखबार व चैनलों की झूठी रिपोर्टिंग, ज़रूरत पड़ी तो पुलिस इस आन्दोलन को कुचलने के लिए तैयार है।
हमें इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि हमें संगठित होने और इस आन्दोलन को सतत आगे ले जाने की ज़रूरत है। क्योंकि शासन-प्रशासन कभी भी हमारे साथ नहीं खड़ा होने वाला। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का जुमला फेंकने वाले जुमलेन्द्र बनारस में मौजूद थे। लेकिन इतनी बड़ी घटना पर चूँ तक नहीं किये।
स्त्रियों के उत्पीड़न की घटनाओं के खि़लाफ़ हमें संगठित होकर एक हाथ से पितृसत्ता का गर्दन दबोचना होगा दूसरे हाथ से मौजूदा व्यवस्था का, जो पितृसत्ता को निरन्तर खाद पानी देने का काम रहती है। हमें अपने आन्दोलन को सही दिशा देना होगा, संगठित होना होगा और स्त्री उत्पीड़न के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से जोड़ देना होगा।

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