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खुटहन लगान न देने पर अंग्रेजी सेना ने 40 सैनिकों संग उन्हें दी थी फांसी

राजा इदारत जहां को दी गई श्रद्धांजलि  खुटहन ( जौनपुर) 10 मई देश की आजादी के लिए अंग्रेजो के खिलाफ खुलेआम युद्ध का ऐलान करने वाले देश के प्...

राजा इदारत जहां को दी गई श्रद्धांजलि 

खुटहन ( जौनपुर) 10 मई
देश की आजादी के लिए अंग्रेजो के खिलाफ खुलेआम युद्ध का ऐलान करने वाले देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राजा इदारत जहां के 161 वें बलिदान दिवस पर गुरुवार को मुबारकपुर गाँव स्थित उनके शहादत स्थल पर एक श्रद्धान्जलि सभा का आयोजन कांग्रेसी नेता इन्द्र मणि दूबे की अध्यक्षता में किया गया। जिसमें उनके प्रपौत्र राजा अंजुम हुसैन सहित कई लोगों ने राजा इदारत जहां के देश प्रेम के जज्बे को नमन कर उनकी मजार पर चादरपोशी व श्रद्धा सुमन अर्पित किया।

श्री दूबे ने कहा कि जहनिया खानदान से ताल्लुक रखने वाले सैय्यद इदारत जहां का जन्म 1801 को आजमगढ जिले के माहुल में हुआ था। इनके पिता  मुबारक जहां और भाई का नाम बराशत जहां था। 1857 मे छिड़े स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजा इदारत जहां ने खुलेआम बगावत कर अंग्रेजो को लगान देने से मना कर दिया। जिससे वे अंग्रेजी सेना की नजर मे किरकियी बन गये। अंग्रेज सैनिक उन्हें बंदी बनाने के फिराक में थे।

उनकी रियासत जौनपुर से लेकर आजमगढ तक फैली हुई थी। दस मई को इदारत जहां मुबारक पुर गाँव के गोमती नदी तट पर बनवाई गई मस्जिद में नमाज करने के बाद वहां से वापस लौट  गाँव के बगीचे में पहुचे। इसकी खबर पहले से ही किसी गद्दार ने अंग्रेज़ी सैनिक को दे रखी थी। जिस पर बगीचे के आस पास मक्के की फसल मे पहले से ही अंग्रेज सैनिक छिपे थे। राजा इदारत जहां के आते ही अंग्रेजो ने हमला बोल दिया। धोखे से हुए आक्रमण से राजा और सैनिक सहम गए। हजारों की संख्या में अंग्रेजी सेना और उनके उस समय के अत्याधुनिक हथियारों  के सामने राजा की सेना ज्यादा देर टिक ना सकी। उन्हें चालीस सैनिकों संग बंदी बना लिया गया। अंग्रेज़ी सैनिकों की तमाम धमकियो के बाद भी जब राजा इदारत जहां ने लगान देने की बात नही स्वीकारी तो वही बाग में एक आम के पेड़ की डाल से उन्हें और चालीस सैनिकों को एक साथ फांसी दे दी गई। जिस हाथी पर राजा सवार थे वह वफादार जानवर भी अंग्रेजो की क्रूरता नही झेल सका। राजा का शव फांसी पर झूलता देख वह भी जोर जोर से चिघाड़ मारकर खुद भी दम तोड़ दिया।

बाद में उसी पेड़ के नीचे उनकी मजार बना दी गई। जहाँ लोग चादरपोसी भी किया करते है।
इसी शहीद स्थल पर गुरुवार को उनके प्रपौत्र राजा अंजुम हुसैन, पूर्व जिला पंचायत सदस्य श्रीमती जया दूबे, मेवालाल यादव, महेन्द्र चतुर्वेदी, अभयराज पाल, जगदम्बा सोनी, चन्द्रेश पासवान, पन्नालाल आदि ने श्रद्धान्जलि अर्पित किया।

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खुटहन लगान न देने पर अंग्रेजी सेना ने 40 सैनिकों संग उन्हें दी थी फांसी
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