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नजर आने लगे विदेशी परिंदे (साइबेरियन), कलरव शुरू

गुजर ताल पर शिकारियों की तिरछी नज़र। ✍अज़ीम सिद्दीकी/ सुरेश कुमार खेतासराय(जौनपुर):- मौसम परिवर्तन के साथ ही साथ इन दिनों सुरहाताल व उसक...


गुजर ताल पर शिकारियों की तिरछी नज़र।

✍अज़ीम सिद्दीकी/ सुरेश कुमार

खेतासराय(जौनपुर):- मौसम परिवर्तन के साथ ही साथ इन दिनों सुरहाताल व उसके आस-पास आने वाले प्रवासी परिंदे (साइबेरियन) नज़र आने लगे है। तथा इनका कलरव की आवाजें भी गूँजने लगी है।
यह विदेशी मेहमान पक्षी साइबेरियन पेट पालने व परिवारों में वृद्धि करने के लिए हज़ारों किलो मीटर दूर का सफर तय कर हमारे उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिला के अंतर्गत स्थित खेतासराय थाना क्षेत्र के गुजरताल, बेरूख का ताल, पोरईखुर्द का ताल जैसे आदि जगहों पर अपना डेरा ड़ालनाशुरू कर दिए है।
खेतासराय-खुटहन मुख्य मार्ग के समीप स्थित प्रसिद्ध गुजरताल में प्रवासी पक्षियों का सबसे ज्यादा जमावड़ा होता है।
 उसकी वज़ह यह हो सकती है कि अन्य तालों के अपेक्षा कुछ ज्यादा ही फैलाव इस ताल का है। विशेषज्ञों की माने तो उनका कहना है कि यह पक्षी साइबेरियन से आते है और इनका घर उन जगहों पर होता है। जहाँ पानी मे बर्फ जैसी परते जम जाती है।
यह पक्षी दो हज़ार से पांच हज़ार किलोमीटर तक का सफर तय करते हैं।
 इन पक्षियों का जो ग्रुप लीडर होता है वह अच्छी जगहों की तलाश करता है कि कौन सा जल क्षेत्र अनुकूल रहेगा।
यहाँ इन पक्षियों का प्रजनन काल भी होता है।
यह यहां पर अपना परिवार बढाते है और मार्च के माह में वापिस अपने देश लौट जाते है।

मेहमानों पर शिकारियों की होती है पैनी नज़र, खामोशी के नींद सुला दिये जाते है परिंदे

ठंड का मौसम आते ही शिकारी अपना ताना-बाना तैयार करके पहले से ही शिद्दत के साथ इन मेहमानों को पैसो की लालच में पैनी नज़र रखकर इंतज़ार करते है।
बदलती आबोहवा और शिकारियों की वजह से अब इनकी सुरक्षा नही की जाती है। यह स्थिति पर्यावरणविदों के लिए तो चिंताजनक है ही, पर्यटन व्यवसाय की नज़र से भी गम्भीर चेतावनी है।
बहरहाल इन पक्षियों की सुरक्षा का जिम्मा जिन जिम्मेदार वन-विभाग के अधिकारियों का बनता है।
उनका खुद ढुलमुल रवैया है। उसके विपरीत इन पक्षियों को बचाने का प्रण हमारे देश के सीमा सुरक्षा बल के जवान जरूर कर रहे है। लेकिन इसके ठीक विपरित शिकारी पैसो की लालच में इन मेहमानों को खामोशी की नींद में सुला दे रहे है।
ठंड आते ही इनके मांस के शौकीनों की संख्या भी बढ़ जाती है। जो प्रवासी पक्षियों के लिए संकट में डाल दिया है।
 इन पक्षियों का मांस बेहद महँगा बिकता है। लिहाजा शिकारियों को दाम भी अच्छे मिलते है। जिंदा मरे पक्षियों का कारोबार इन दिनों शुरू हो गया है। जैसे-जैसे ठंडी बढ़ती जाएगी वैसे-वैसे शिकारियों का यह कारोबार तेज़ होता चला जायेगा।
शिकारी क्षेत्र में प्रवासी पक्षियों की जगहों पर बेहोशी की दवा दानों या छोटी मछलियों में मिलाकर डाल देते है। इसे खाने से पक्षी बेहोश हो जाते है और घात लगाये बैठे शिकारी लपककर पकड़ लेते है। नशीली दवा खाने से बेहोश या दमतोड़ चुके पक्षी को खाने से मानव स्वास्थ्य पर कोई बुरा असर नही पड़ता। क्योकि नमक डाले
पानी से मांस का शोधन करने से दवा का असर एकदम खत्म हो जाता है।

बढ़ रहे प्रदूषण की आंच पहुँच रही अब इन परिंदों तक भी

प्रवासी पक्षियों का मुख्य भोजन छोटी-छोटी मछलियां तथा उससे मिलते-जुलते कीड़े-मकोड़े व जीव-जंतु है। लेकिन बढ़ते प्रदूषण सीवेज का पानी, इलेक्ट्रॉनिक और घरेलू प्लास्टिक कचरे जमा होने की वजह से विदेशी परिंदों की आमद पिछली सालो की अपेक्षा काफी कमी आ रही है। उसकी मुख्य वजह तालाबो में कम पानी और आहार की कमी हो गई है। जिससे अब विदेशी मेहमान पक्षियों मुँह मोड़ने लगे है। पार्क क्षेत्र के जंगलो व तालाबो में पर्यावरण के साथ खिलवाड़ की आंच अब परिंदों तक जा पहुँची है। पारिस्थितकीय तंत्र के बिगड़ने की वजह से पक्षियों के जीवन चक्र पर विपरीत असर पड़ रहा है।

हवा-हवाई बातो से सुरक्षा करते है जिम्मेदार

विदेश से आने वाले मेहमानों की सुरक्षा करने की बागडोर जिनके हाथो में मिली है। वह सिर्फ बातो और कागजो पर सुरक्षा सिमट जाती है। हकीकत तो कुछ और ही बया करती है। जिससे विदेशी परिंदों का शिकार शिकारी धड़ल्ले से कर रहे है। और दिनोदिन शिकारियों की तादाद बढती ही जा रही है। इन शिकारियों पर न तो वह विभाग अमले का कोई ठोस अंकुश दिखाई दे रहा है न ही पुलिस का। यदि जिम्मेदार खिलाफ पूरी ईमानदारी से जिम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे और शिकारियो पर अंकुश लगाए तो मज़ाल है की मेहमानों को खामोशी की नीद सुला पाएं शिकारी। यदि ऐसा ही होता रहा तो आने वाले दिनों में इससे मुक्ति के लिए कोई ठोस उपाय नही तलाशा गया तो क्षेत्र के तालाबो में होने वाले मनमोहक मनोरम हमेशा के लिए रूठ जाएगी।।।।

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