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इतिहास के आईने में अध्याय बनकर शामिल हुआ क्लास

*✍सुरेश कुमार* घर के बाउंड्री वाल के अन्दर दक्षिणी छोर पर बने एक छोटे से छप्पर में लगे मेज़ कुर्सी पर बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहा हूँ और ...


*✍सुरेश कुमार*

घर के बाउंड्री वाल के अन्दर दक्षिणी छोर पर बने एक छोटे से छप्पर में लगे मेज़ कुर्सी पर बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहा हूँ और एक तरफ पल-पल को बीते हुए घड़ियों को महसूस कर राइट डाउन कर रहा हूं। जो इतिहास के आईने में अध्याय बनकर शामिल होगा। शाम का वक्त है, पछुआ की सर्द हवाओ के झोंके हल्का-हल्का झरोखों से आ रही है। लम्बा हो रहा है इसमे मेरी कोई गलती नही है। आपने ऐसा किया ही है। कलम रुक ही नही रही है। कलम मेरी कितना भी तारीफ आलोचना अथवा सुझाव दे ले कर्म के आगे सब फीकी है। याद आ रहा है आपकी बातें, आप स्वतन्त्र है खूब लिख सकते हो, धुंआधार लिखो, बेबाक लिखो, जमकर लिखो लेकिन देखो चापलूसी एकदम मत करना और मुझे पसन्द भी नही है, ओके सर।

एक लाइन में समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन कलम किसी कीमत पर मानने को तैयार नही हो रही है। तो आइए चलते है आपको लेकर उनके कदमो तक जो पल-पल अपने अनुभवों को साझा करते हुए आपको गर्त में जाने से पूरी तरह से बचाने का प्रयास करते है। यही खास वजह है। जिनका नाम सुनकर चापलूस भी बिल में घुस जाते है जैसे बिल्ली को देखकर चूहा बिल में घुस जाते है। चाहे वह कॉलेज हो या कोई अन्य जगह हो। यदि आप जौनपुर में या कही अन्य जगह उपस्थित है तो आपके साथ अन्याय हो रहा है उसके खिलाफ कोई डटकर बोल रहा है और अपने तार्किकता के माध्यम से न्याय दिलाने की कोशिश कर रहा है तो समझिए शायद वो विमल सर ही है।

मध्यक्रम की लंबाई शरीर वही दुबला - पतला फिरंगी की तरह काम पढ़ने और लिखने वाले विमल सर को शिखर के चन्द लाइन खुली किताब उठान दास्तान... वाली में समेट कर बताने का कोशिश कर रहा हूँ। आपका ध्यान खिंचकर मिले ज्ञान व अनुभवो से रूबरू कराने का प्रयास भी कर रहा हूँ। बेशक, उच्च ज्ञान की प्राप्ति, नए ज्ञान की खोज और सत्य की पहचान कराने की ललक बेहद शानदार व उम्दा मुस्कान की चापलूस भी सरमा जाएं। खास तौर पर जौनपुर के उन अभ्यर्थियों के भविष्य को सवारने के लिए जो आपने सपना देखा बेहद शानदार और उसको पूरा करने के लिए योजना बनाकर मील का पत्थर साबित हो रहे मंज़िल को पास लाने का पूरा प्रयास किया। इसके सभी छात्र आपका आभारी है।

इसके लिए न जाने कितनी इच्छओं का आपने दमन किया बया कर पाना मुश्किल है। टाइटिल आपका पढ़ना एक फैशन नही बल्कि पैशन है। उम्दा लाइन इसी को आपने ध्यान में रखकर इसी को धार देने में जुट गए। लोगो को इतला कर दिया गया सब गदगद भी हो गए। तैयारियां शुरू हुई। जोशीली अंदाज़ में जोर-खरोश के साथ विमल सर के छांव में पहले तो आपने मील के पत्थर साबित हो रहे मंज़िल पहाड़ को खण्डवार तोड़कर छोटा-छोटा कर सकारात्मक भावनाएं लोगो मे पहले पिरोया। और यू चुटकियां बजाते हुए एक-एक टॉपिक को अच्छे से पढ़ाते और समझाते हुए चल रहे है।

टॉपिक पे टॉपिक का दमन करते हुए आगे बढ़ रहे है। और हुआ भी वही जैसे राजधानी एक्प्रेस किसी स्टेशन से छूटते ही पहले धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। और कुछ ही दूर आगे बढ़ते ही अपने मौसम में वैसे एकदम एक पर एक दमदमा टॉपिक पर टॉपिक लोगो को डुबाकर पढ़ाते-समझाते निकलने लगे। जो लोगो को मनभावन लग रहा था। टॉपिक के हर पड़ाव पर ठहर कर इत्मीनान से छूटे हुए प्रश्नों को समेटने खूब कोशिश किया कि इस निशाने से कोई चूकने न पाएं।जब आप इस दौरान टॉपिक के पड़ाव पर ठहर खूब समझाने का प्रयास कर रहे थे तो इसी दौरान बात पड़ने पर जब आपकी साहित्यिक इच्छा जाग्रित हो जाती रही या जब साहित्यिक ज्ञान अंदर से हिलोरे मारती रही तो आप तत्काल सक्रिय हो जाते रहे तो चन्द सेकेंडो में कवियों का परिचय भी शार्ट कट में बता दिया करते थे।

ऐसा ही कुछ ज्यादा जब आपने आराम से कहा कि गोरी सोवै सेज पर.... फिर क्या बात है पूछिये मत वही स्टाइल जिस पर लोग ठहाके लगाने को मजबूर हो जाते रहे। कितने तो सिर्फ आपकी तरह कभी-कभी आधी इंची मुस्कुराकर रह जाते रहे। एक- एक दिन यू बीतता चला गया और न जाने कब तीन माह बीत गया पता नही चला जैसे ठंड का सूरज कब निकला और कब अपनी माँ के गोद मे चला गया। लेकिन इसी बीच आपने अपने सांचे में लोगो को सलीके से ऐसे ढाला की जहाँ भी रहेंगे यह लोगो को एहसास हो जाएगा और शायद पूछ भी कोई सकता है की कही आप विमल सर के तो शिष्य नही।

इन सबके साथ आप वो एक चिराग रहे जो भारी भरकम आंधियो पर भारी है। जिसकी स्पष्ट झलक आपके चेहरे से ही लगता है। एक क्लास के दौरान बात आपकी ही देखों हम गलत नही बर्दाश्त कर पाते क्यो न ही आप तीस मरखा क्यो न हो आप होंगे भी अपने यहाँ के होंगे। होना भी चाहिए जो सही है तो है लेकिन ये भी मुस्कुराकर। आपका मुस्कान समझना चापलूसो के लिए टेडी खीर है। उनकी बस से बाहर है। इसीलिए आप वो चिराग है जो भवंडर भरी आंधियो पर भी भारी है। चाहे वो किसी भी मामले हो।

यदि आप मे गुण है जज्बात है तो कही आप मे अवगुण भी है इसकी हम आलोचना करे या सुझाव दे। क्लास के दौरान खिड़कियां खुली रहा करती थी हवा भी आता रहा। तभी पीछे से तेज़ आवाज में गणेशाय भगवान की जय... जैसे शब्दों का कान को भनक लगते ही आप आदेश पारित कर देते रहे जिसका पालन करते हुए लपककर सभी खिड़कियां बन्द कर दिया जाता रहा। जो धीरे-धीरे आदत सी बन गई थी। आप टुटपुंजिया नामक शब्द का ताज पहनकर उद्घोष करने वालो को आड़े हाथे ले लिया करते थे। लेकिन वो भी सलीके से हालांकि आप किसी की भावनाओ को आहत नही पहुचाते रहे। न ही यह प्रयोजन होता था आपका।

लेकिन भविष्य के लिए सलाह जरूर था। सलाह दे रहे थे जिससे भविष्य सुनहरा हो सकता है आप लोग जानते है इससे कम्पटीशन को बिल्कुल नही निकाला जा सकता है दो राय नही। इसी को समझाने के लिए आप तर्क देकर आसानी से बातों में जान ले देते थे। यहाँ तक कि आपकी बातों से लोग इतना प्रेरित भी हो गए थे कि क्लास की चौखट पर पाव रखने से पूर्व भूल से भी मस्तक पर लगे तिलक को ऐसे मिटा लेते थे कि जैसे कोई घर मे पोछा मारकर साफ किया हो। जब भी पढ़ाते समय आप हर पड़ाव पर ठहरते थे तो लोगो को किसी प्रकार का कन्फयूजन होने पर क्लीयर करने की बात कहते थे।

बीच-बीच मे जब कभी सवाल कोई पूछता रहा तो आप बड़ी आसानी मुस्कुराते हुए चन्द शब्दो मे देकर सन्तुष्ट कर देते रहे। लेकिन वही विडम्बना भी रही हम लोग अल्पसंख्य वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे है। जब कोई बीच मे आपसे सवाल दागता रहा तो आप जो आ रहा था उसे तो डटकर बताते रहे जिसका ऋणी है हम लोगों लेकिन जब आपका उस सवाल के जवाब ध्यान नही आता था या एकदम नही आ रहा था तो आप उस समय बहकाने से पूरा परहेज़ करते हुए स्पष्ट कह देते रहे को इसको देखकर या क्लीयर करके बताऊंगा या फिर वही सीधा सा एक खुराग दवा की तरह ठीक देखकर बताऊंगा नामक घुट्टी पिलाकर आगे बढ़ लेते रहे। इसकी मुख्य वजह बस वही भाग-दौड़ की जिंदगी में चित्त में चढ़ गया तो खाली नही जाएगा। कुछ तो जरूर आएगा। न नामक कोई शब्द ही नही।

लेकिन कई सवाल के जवाब आपके ध्यान में न चढ़ने के अभाव में मलाल जरूरी रही। हालांकि आप प्रश्न को लिखकर किसी प्रेम पत्र की तरह देने की सलाह भी दे दिया था। लेकिन इसका जहमत उठाने कोई कोशिश भी नही किया। और आप जब पढा कर वापिस घर जाते रहे तो बाइक पर बैठकर यू मोड़ते रहे वो भी बिना इंडिकेटर जलाए, न तो किसी इशारा के टीडी कॉलेज के मेन गेट से यू मोड़ देते रहे जो यातायात नियम की पूरी तरह से विरुद्ध है। इसका मैं भी विरोध करता हूँ।और दूसरी बात ये है आप बहुत चालक है। जौनपुर के हौसला बुलन्द चोरो को चकमा देने के लिए आपने बाइक को कभी इधर खड़ी किया तो कभी इधर, कभी रोड उस पर तो कभी इस पार।

इसी तरह तीन माह पढ़ते-पढ़ाते बीत गया। जाते-जाते आपके इतिहास में एक अध्याय भी जुड़ गया कि मात्र इकलौता दिन टीडी कॉलेज के मैदान में दरी पर बैठाकर पढा दिया। जो परिस्थितयो की उपज रही। और उस पर आसन लगाकर बैठकर पढ़ना वही बचपन की शिशु वाली कक्षा की याद दिलाकर ताजा कर दी थी। ये है जज्बा इसको सभी छात्रों की तरफ से सैल्यूट। कुल मिलाकर यह जरा भी अतिशयोक्ति नही रहा आप एक अच्छे न्यायप्रिय बेबाक सर रहे आपके अंदर तो कवि हृदय भी विद्यमान है जो स्व0 अटल विहारी वाजपेयी की परम्परा में लाकर आपको खड़ी करती है। पीठ पीछे आपकी चर्चा गाहे-बगाहे चर्चा भी हो रही थी।

जेन्युआइट बलवंत सर से उन्होंने आपको प्रोग्रेसिव बताते हुए कहा कि वाकई स्पष्टता और तार्किता के साथ अपनी बात को मुस्कुराते हुए रखने में पीछे नही हटते है। तो हमने पूछा यह आपने कब स्पष्टता से देखा तो उन्होंने टपाक से कहा कि यह बात मैं लोगो से जब से आया हूँ तभी से सुना रहा था। लेकिन लखनऊ साथ यात्रा के दौरान पूरी स्पष्टता के साथ निहार भी लिया था। यह एक अच्छे इंसान की पहचान है। चलते - चलते फिर से शुक्रिया, जो आपने ने इस तरह से सोचने और लिखने की मजबूर किया। हमारी मेहनत की खामियों से हमें अवगत भी कराएं, ऐसी इल्तज़ा है।

यह मेरा निजी राय है।

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