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लोकतंत्र का प्रहरी मीडिया को आत्मवलोकन की जरूरत

ऐसे समय मे जब मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे है तब इसकी भूमिका का निष्पक्ष तरीके से पड़ताल किया जाना आवश्यक हो जाता है, क्योकि इसी ...

ऐसे समय मे जब मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे है तब इसकी भूमिका का निष्पक्ष तरीके से पड़ताल किया जाना आवश्यक हो जाता है, क्योकि इसी पर लोकतंत्र का भविष्य टिका हुआ है, जबकि मीडिया को लोकतंत्र का प्रहरी समझा जाता है।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। मीडिया जनता के अधिकारों एंव स्वतन्त्रताओं का प्रहरी है। सरकार की नीतियों का सहृदय आलोचक भी है और जनता तक सूचनाएं पहुँचाने का सर्वाधिक सशक्त माध्यम है। मीडिया स्वतन्त्र हो, यह लोकतांत्रिक राष्ट्र के अस्तित्व के लिए अनिवार्य शर्त होता है। इसका कारण यह है कि यदि मीडिया स्वतन्त्र नही है, तो विभिन्न प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति मिल सकती है, न ही सरकार की गलतेंव सही नीतियों का प्रकाशन हो सकता है औरन ही राष्ट्र में स्वस्थ जनमत का निर्माण हो सकता है। मीडिया की इस बहुमुखी भूमिका को देखते हुए हैराल्ड लास्की ने तो आपातकाल परिस्थितियों में भी मीडिया की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगाने को अवांछनीय माना है। इस संदर्भ में वे लिखते भी है -  " एक नियंत्रणहीन कार्यपालिका अधिनायकवाद की समस्त प्राकृतिक भूल करेगी। यह अर्द्ध- दैवीय भूमिका का निर्वाह करेगी। मीडिया पर प्रतिबंध लगाने से तो जनता उन सूचनाओ सही वंचित हो जाएगी, जिनके आधार पर जनता को सरकार का मूल्यांकन करती है।"

आधुनिक काल मे मीडिया मानव मूल्यों की गरिमा बनाये रखने के लिए तथा मनुष्य के राजनैतिक एंव सामाजिक अधिकारों की रक्षा करने का सशक्त माध्यम है। इसलिए मीडिया लोकतंत्र का प्रहरी समझा जाता है। सरकार के तीन अन्य स्तम्भ व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एंव न्यायपालिका है। भारतीय संविधान में प्रेस के लिए कोई अलग से उपबन्ध या अनुच्छेद नही है। लेकिन अनुच्छेद 19(1) (क) के वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अन्तर्गत इसे रखा गया है। यद्यपि संविधान ने वाक एंव अभिव्यक्ति शब्द को पूर्णतः परिभाषित नही किया गया है। लेकिन अनेक न्यायिक निर्णयों में संविधान के अनुच्छेद 19(1) (क) के अन्तर्गत प्रेस की स्वतंत्रता को भी स्वीकार किया गया और वाक एंव अभिव्यक्ति शब्द को परिभाषित किया गया। इंडियन  एक्सप्रेस समाचार पत्र (बम्बई) प्राइवेट के मामले में प्रेस की स्वतंत्रता को वाक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी एक अंग माना गया है।

यदि वर्तमान समय में मीडिया वह कड़ी है जो एक देश को सम्पूर्ण विश्व से जोड़ती है। प्रसिद्ध तानाशाह नेपोलियन का विचार था कि मीडिया अत्याचार, अन्याय और अदक्षता के खिलाफ एक सशक्त शास्त्र है। नेपोलियन ने कहा है कि - "मैं हज़ारों संगीनों की अपेक्षा तीन समाचार पत्रों से अधिक डरता हूँ।" नेपोलियन के ये कथन स्वमेव समाचार पत्रों की महत्ता को स्पष्ट करते हुए नेपोलियन के विचार को अकबर इलाहाबादी ने इस रूप में व्यक्त किया है - 'खींचो न कमान को न तलवार निकालो, जब तोप मुकाबिल न हो तो अखबार निकालो।' आधुनिक समय मे जहाँ एक तरफ मीडिया जनता को देश की राजनैतिक, समाचार एंव आर्थिक स्थितियों की जानकारी देता है। वही विदेश में घटी घटनाओ और बदलते सामाजिक एंव राजनैतिक मूल्यों से भी अवगत कराता है। आज से ही नही क्रांति के प्रारम्भिक अवस्था से ही देश के सवंत्रता के प्रति जनमानस में क्रांति की चेतना जाग्रत करने का वीणा मीडिया ने ही उठाया है। लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में ख्याति प्राप्त विद्वान लिपमैन ने समाचार - पत्र को लोकतंत्र का धर्मग्रन्थ तक कह डाला है। वही पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति थॉमस जैफरसन ने भी मीडिया की महत्व पर बल दिया और कहा - "यदि हमें सरकार युक्त किन्तु मीडिया विहीन राष्ट्र और मीडिया युक्त सरकार विहीन राष्ट्र में किसी एक को चुनना हो तो मैं निःसंकोच बाद वाली व्यवस्था का ही चयन करुंगा।"

वास्तव में मीडिया लोगो के इच्छा विरोध समर्थन एंव आलोचना सब कुछ प्रकट करती है। यही कारण है कि बड़े से बड़ा राजनेता भी प्रेस से भयभीत रहता है। सूचना प्रौद्योगिकीय के विकास के काल मे मीडिया का अर्थ अत्यधिक व्यापक हो गया है। आज मीडिया का अर्थ समस्त साधनों से लिया जाता है। दूसरे शब्दों में अगर कहे तो समाचार संवहन की वाहन गाड़ी के प्रिन्ट मीडिया व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया नामक दो पहिया है।

आज तहलका, बोफोर्स काण्ड तो पुराने हो गये, टी0वी0 खोलते ही हर - न्यूज़ चैनल पर हर घण्टे ब्रेकिंग न्यूज़ जैसा कुछ आइटम कुछ - न - कुछ धमाल मचाता रहता है और यह सोचने को मजबूर कर देता है कि क्या सच मे भारतीय राजनीति जो लोकतांत्रिक है इतनी दूषित है या हो गई है ? और इतना ही नही वर्तमान समय में जो चल रहा है अगर इसे देखे राम मन्दिर मुद्दा, हिन्दू - मुस्लिम का मुद्दा, शहरों के नामकरण का मुद्दा, कश्मीर पाकिस्तान का विवाद आदि ऐसे तमाम मामलो को सिर्फ मीडिया को दिखता है ? क्या, यह नही दिखता जो रामलीला मैदान तथा जंतरमंतर पर किसानों के आंदोलन, दम तोड़ते आत्म - हत्या करते किसान, भात-भात करते दम तोड़ देने वाली उस किशोरी की चीख, रोजगार हीनता के कारण भटकते नौजवान युवा, राफेल डील के सन्दर्भ में तर्क संगत बाते जैसी चीजों को क्यों नही मीडिया बढ़-चढ़ कर भागीदारी करती।

भ्रष्टाचार के खत्म करने का जो सपना जो अन्ना हज़ारे देखते थे या सरकार भ्रष्टाचार को खत्म मुक्त करने की बात कही थी वह कहा है। लोकपाल आज अस्तित्व में क्यो नही आ पायी इस पर मीडिया अभियान क्यो नही चलाया। यहाँ तक कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की घटना भी यदा - कदा आती रहती है। इतना तक नही बल्कि न्यायधीश न्याय मांगने के लिए मीडिया के सामने आये लेकिन उस पर भी तर्क संगत बहस नही हुई। आजकल मीडिया खबर के नाम पेड़ न्यूज़ चलाती है और जोर शोर से व्यवसायिकरण चल रहा है। खबरे गढ़ी जा रही है। खबर के नाम पर सनसनी फलाई जा रही है। यहाँ तक कि मुख्यधारा के लोकप्रिय चैनल व अखबार भी सरकार की चापलूसी करने में अमादा है। वही राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े राफेल डील आरोप-प्रत्यारोप लगते आ रहे है। क्या इस मीडिया को आगे आना और सच्चाई को सामने लाना चाहिए। इस सब चीजों से निपटने के लिये कही न कही हम सबको आत्म मूल्यांकन करने की जरूरत है। मीडिया को पीत-पत्रकारिता से कोसो दूर रहकर बचना चाहिए। और यह कर्तव्यबोध होना चाहिए कि तथ्यों तो तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत नही करना चाहिए तथा ऐसी खबरे न प्रकाशित करे। जो देश की एकता, अखण्डता एंव शांति पर आंच पहुँचा सके। इसके लिए एक आचार संहिता का विकास होना चाहिए। जिससे मीडिया अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का दुरुपयोग न कर सके। केवल एक स्वस्थ मीडिया ही लोकतंत्र का सच्चा प्रहरी होता है।

✍शोधार्थी :- सुरेश कुमार

राजनीति विज्ञान विभाग

टी.डी.पी.जी कॉलेज जौनपुर

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