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डॉ0 भीमराव अम्बेडकर का लोकतंत्र व संविधानवाद पर विचार

✍अज़ीम सिद्दीकी                 सामाजिक न्याय के चैंपियन और भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता बाबा साहेब डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ने भारत वर्ष के ...

✍अज़ीम सिद्दीकी

                सामाजिक न्याय के चैंपियन और भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता बाबा साहेब डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ने भारत वर्ष के लिए लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को प्रस्तुत किया जिस पर चलते हुए नवस्वतंत्र भारत अपने विकास की यात्रा में निरंतर चौमुखी उचाईयों को स्पर्श करने में सफल रहा और भारत के लोकतंत्र की विकास यात्रा आज भी निर्बाध गति से जारी है। भारत के लोकतंत्र के समावेशी स्वरूप की आज विश्व भर में प्रशंसा की जाती है तो इसका क्रेडिट मुख्य रूप से बाबा साहेब डॉ0 भीमराव अम्बेडकर को जाता है। बाबा साहेब के लिए लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली भर नहीं थी बल्कि एक समग्रता भी थी। बाबा साहेब ने लोकतंत्र के सभी आयामों को प्रस्तुत किया। बाबा साहेब ने लोकतंत्र को एक जीवन पद्धति के रूप में देखा और इसे उसी रूप में अपनाया। अपनी सम्पूर्णता में लोकतंत्र बाबा साहेब के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सरोकार वाला रहा। बाबा साहेब ने अपने जीवन के अनुभवों से लोकतंत्र के तीनों आयामों को सींचा और अपनी प्रखर मेधा शक्ति से लोकतंत्र को पल्लवित और पुष्पित किया। भारत के लोकतांत्रिक संवैधानिक प्रणाली को लेकर आलोचकों ने यह कहकर चिंता और आशंका जताई थी कि यह बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकता लेकिन जब हम अन्य देशों को देखते है जिन्होने लोकतंत्र को तो स्वीकार किया था परन्तु उन देशों में शीघ्र ही यह मुरझा गया, वही भारत के लोकतंत्र ने सफलताओ के नए-नए कीर्तिमान गढ़ा और आज भी इसकी यश पताका लहरा रही है तो ऐसे में हम बाबा साहेब डॉ0 भीम राव अम्बेडकर के उस व्यावहारिक बुद्धि प्रयोग को भूल नही सकते जिन्होने यहाँ के सामान्य जन - जीवन में लोकतंत्र के प्रति तीव्र भूख पैदा कर दिया। एक ऐसी भूख जिसमें लोकतंत्र की आत्मा को ही आत्मसात कर लिया और जिसने तानाशाही को भी झुकने के लिए मजबूर कर दिया। उन तमाम आशंकाओं को निर्मूल कर दिया जो जाहिर की गई थी अपनी तमाम विविधताओं से भरे भारत वर्ष में लोकतंत्र का अनवरत जारी रहना बाबा साहेब डॉ0 अम्बेडकर को एक सच्ची श्रद्धांजलि ही है।

              लोकतंत्र पर डॉ0 बाबा साहेब अम्बेडकर ने लोकतंत्र के बारे में जो विचार प्रस्तुत किया है उसका सीधा सम्बन्ध उसकी संविधानवाद की प्रति समझ से भी है। इसलिए संविधानवाद कि संकल्पना पर चर्चा इस विचार सम्मत है। लोकतंत्र पर उनके विचारों का विशद विवेचना है जिसमें लोकतंत्र के सभी आयामों पर बाबा साहेब के विचारो को शामिल किया गया है।भारत मे लोकतंत्र की सफलता के लिए आवश्यक रणनीति के रूप में संविधानवाद की संकल्पना पर बाबा साहेब के विचारों का वर्णन करता है। क्योंकि बाबा साहेब के लिए संविधानवाद तौर - तरीके को अपनाएं बिना लोकतांत्रिक लक्ष्यों की सिद्धि नहीं की जा सकती। इस बात से है कि वर्तमान समय मे बाबा साहेब का लोकतंत्र के प्रति समझ वर्तमान पीढ़ी के लिए किस तरह उपयोगी हो सकती है।

          लोकतंत्र को सीमित और व्यापक दोनों रूपो में परिभाषित किया जाता है। सीमित रूप में लोकतंत्र को एक शासन व्यवस्था समझा जाता है। इस रूप में लोकतंत्र से तात्पर्य जनता के शासन से है शाब्दिक रूप से ही 'डेमोक्रेसी' शब्द 'डेमोस' और 'क्रेटोस' शब्दों के मिलने से बना है। डेमोस का अर्थ है जनता और क्रेटोस का अर्थ है शासन, अर्थात लोकतंत्र जनता का शासन से है। अब्राहम लिंकन, जान सीले, लार्ड ब्राइस आदि ने शासन व्यवस्था के रूप में ही लोकतंत्र को परिभाषित किया है। अपने सीमित रूप में लोकतंत्र का राजनीतिक पहलू अधिक महत्वपूर्ण होता है। जब लोकतंत्र को सीमित रूप में परिभाषित किया जाता है तो लोकतंत्र की संस्थाएं और प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण मानी जाती है। अपने सीमित रूप में लोकतन्त्र केवल एक साधन है। लेकिन सामाजिक राजनीतिक दर्शन में लोकतंत्र को व्यापक रूप में परिभाषित किया जाता है। दार्शनिक दृष्टि में लोकतंत्र एक शासन व्यवस्था होने के साथ-साथ एक मूल्य व्यवस्था भी है और लोकतंत्र का तात्पर्य स्वतन्त्रता, समानता, न्याय, भ्रातृत्व व सहनशीलता आदि मूल्यों में भी है। व्यापक रूप में लोकतंत्र के राजनीतिक पहलू के साथ-साथ अन्य पहलू भी महत्वपूर्ण होते है और सामाजिक लोकतंत्र, आर्थिक लोकतंत्र और सांस्कृतिक लोकतंत्र वैसे विचार भी प्रचलित है। अपने दार्शनिक रूप में लोकतंत्र एक शासन पद्धति में आगे बढ़कर एक जीवन पद्धति बन जाता है। जीवन पद्धति के रूप में लोकतंत्र के आशय है कि व्यक्ति जीवन लोकतांत्रिक मूल्यों से ओत-प्रोत हो। जब व्यापक रूप में लोकतंत्र को परिभाषित किया जाता है तो लोकतंत्र की संस्थाओं और प्रक्रियाओं की तुलना में लोकतंत्र के आदर्श अधिक महत्वपूर्ण माने जाते है। अपने व्यापक रूप में लोकतंत्र साधन न होकर साध्य बन जाता है और व्यक्ति, राज्य, सरकार तथा समाज प्रत्येक का उद्देश्य लोकतंत्र की प्राप्ति बन जाता है।

          लोकतंत्रीय व्यवस्था दूसरों से बेहतर है क्योंकि इसमें हमें अपनी गलती ठीक करने का अवसर मिलता है क्योंकि गलतियों पर सार्वजनिक चर्चा की गुंजाइश लोकतंत्र में है और फिर इनमें सुधार करने की अवसर भी है तथा इसके साथ ही साथ लोकतंत्र हमें सब चीज नहीं दे सकता और ना ही यह सभी समस्याओं का समाधान है लेकिन यह साफ तौर पर उन सभी दूसरी व्यवस्थाओं से बेहतर है जिन्हें हम जानते है और दुनिया के लोगों को जिनका अनुभव है। इस व्यवस्था में स्वतन्त्र चर्चा के आधार पर सारे सार्वजनिक निर्णय किए जाते है। व्यक्तियों के अधिकारों पर बल दिया जाता है। ऐसे व्यवस्थाओं के प्रणाली की परिभाषाओं का विश्लेषण करने के बाद यह विचार उभरकर सामने आया जिसका संविधान निर्माण के समय रखने वालों में से एक बहुआयामी प्रतिभा के धनी दलितों के मसीहा तथा संविधान के शिल्पकार डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ने किया है और स्वाधीन भारत के राष्ट्रीय एकता और अखण्डता को कायम रखने के लिए लोकतंत्र का पुरजोर समर्थन किया।

      विधिवेत्ता और कानून की महत्ता पर अटूट विश्वास रखने वाले अम्बेडकर इस लोकतंत्र के सम्बन्ध में मात्र बाते ही नही बल्कि इस संदर्भ में वे एक सिंद्धान्तवादी से अधिक अर्थक्रियावादी भी थे। वे व्यावहारिक लोकतंत्र में दृढ़ता से विश्वास रखते थे तथा विश्व के लोकतांत्रिक देशों की और प्रेम एंव मित्रता का हाथ बढ़ाया। बाबा साहेब मुख्य रूप से जरूरतमंदों एंव निम्नस्तरीय लोगो की सेवा से सम्बन्ध रखते थे। मानवता की सेवा पर पर्याप्त बल दिया था। बाबा साहेब भारतीय समाज का अध्ययन करते हुए उसके बारे में एक नई सोच पैदा किया था। उन्होंने कहा था कि भारत मे भक्त होना आसान है लेकिन समझदार होना मुश्किल है।

          भारत के शासन प्रणाली के रूप में लोकतंत्र के विकल्प का चयन सन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद भारत मे किस प्रकार की शासन पद्धति को अपनाया जाएं तो हमारे संविधान निर्माताओं में से मुख्य रूप से बाबा साहेब ने देखते हुए कहा कि - मानव शक्ति को उन्मुख करने के लिए कोई व्यवस्था इतनी प्रबल नहीं हो सकती जितनी कि लोकतंत्र। जिसमें व्यक्ति को शिखर तक पहुँचने का अवसर मिल सकता है। लोकतंत्र में स्वतन्त्रता को सकारात्मक शक्ति और क्षमता के रूप में देखा तथा लोगो को आर्थिक प्रक्रियाओं और शोषण, सामाजिक, संस्थाओं और धार्मिक रूढ़िवादिता तथा भय और पूर्वाग्रहों द्वारा प्रतिबंधित हुए बिना उन्हें अपनी पसन्द चुनने के योग्य बनाता है। इन्होंने इसी को प्राप्त करने के लिए तथा इससे पीड़ित लोगों के उद्धार के लिए न केवल आवाज ही बुलन्द कि बल्कि उसके लिए ठोस कार्य भी किया। जो सामाजिक क्षेत्र में एक क्रांति के रूप में आज भी प्रासांगिक है तथा लोकतंत्रीय मूल्यों व आदर्शो को प्राप्त करने के लिए लोकतंत्रीय शासन प्रणाली की स्थापना में जिस महत्वपूर्ण भूमिका निर्वहन किया। बाबा साहेब लोकतंत्र से अत्यधिक प्रभवित थे उनके लिए लोकतंत्र का आशय दासता, जातिवाद, उत्पीड़न से विहीन समाज था। लोकतंत्र की जड़े समाज मे मनुष्य के आपसी सबंधो में ढूढी जा सकती है। यह फैसलों के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराता है। जिसमें लोगो की इच्छाओं का सम्मान किए जाने की ज्यादा सम्भावना है। मनुष्य के कल्याण एंव मानवाधिकारों पर अत्यधिक बल देते थे। उनकी दृष्टि में लोकतंत्र सर्वसत्तावाद, निरंकुशतावाद, फासीवाद एंव अराजकतावाद से पूर्णतः विपरीत है। जहाँ तक सम्भव हो सके मानवाधिकारों में सहभागी हो। जिसके बिना मानव जीवन जीने के योग्य रहता है उन्होंने एक स्थान पर लोकतंत्र पर जोर देते हुए कहा कि वास्तविक लोकतंत्र तभी आएगा जब किसी को भी भूखे पेट सोने की जरूरत नहीं रहेगी यही लोकतंत्र की सच्ची कसौटी है। जहाँ मिल जुलकर रहने का तरीका का वकालत किया जाता है जिसमे लोग आपस मे सारे दुःख-सुख बाट लेते है सहचरों के प्रति आदर और सम्मान की भावना है।

         गाँधीजी शक्तियों के विकेंद्रीकरण और पंचायत - राज के समर्थक थे वही बाबा साहेब देश की एकता और अखण्डता के हित मे एकात्मक शासन प्रणाली का समर्थन किया और वीर पूजा का विरोध करते हुए लोकतंत्रीय सरकार सबसे बड़ा खतरा बताया। लोकतंत्र के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा - जातिवाद, जिसके बारे में बाबा साहेब ने बताया कि यह सामाजिक जीवन मे लोकतंत्र स्थापित नहीं सकते है यदि हो भी जाएगा तो ज्यादा दिन तक नही टिकेगा। राजनीति बहुमत साम्प्रदायिक बहुमत में अन्तर करते हुए अम्बेडकर ने आगे कहा कि राजनीतिक बहुमत का सदस्य राजनीति कार्यवाही में कोई योगदान करने की अपेक्षाकृत स्वतन्त्र होता है परन्तु साम्प्रदायिक बहुमत का सदस्य केवल वही राजनीतिक कार्यवाही कर सकता है जो विशेष सम्प्रदाय में जन्म लेने के कारण उसके लिए निर्धारित करती है। पंचायत राज को अस्वीकार करते हुए गांव शासन की इकाई बना देने पर व्यक्ति का अस्तित्व दब जाता है गाँव मे केवल स्थानीय एंव संकीर्ण हित की बात सोची जाती है। गांव हमारे जहालत, तंगदिली और सम्प्रदाय के अड्डे है ग्राम प्रशासन के पुनरुत्थान का विचार विनाशकारी है। इस सम्बंध में उनका दृष्टिकोण पकण्डित जवाहर लाल नेहरू की तरह था।

          संविधानवाद समान्यतः संविधान पर आधारित विचारधारा है जिसका मूल अर्थ यही है कि शासन संचालन संविधान के प्रावधानों के अनुरूप हो। व्यवहार में संविधानवाद शासन के ऊपर एक प्रकार की प्रभावी अंकुश लगाने की व्यवस्था है ताकि शासन तानाशाही का रूप न हो सके और जनता के वे राजनीतिक आदर्श सुरक्षित रहे जिनकी प्राप्ति के लिए वे राज्य कर अधीन रहना स्वीकार करते है। जनता के राजनीतिक आदर्शो व आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति संविधान में होती है। संविधानवाद जनता के आधार - भूत मांगो, आकांक्षाओं और मूल्यों की व्यवहार में उपलब्धि है। इसी अर्थ में संविधानवाद संविधान के नियमों के अनुरूप शासन संचालन से अधिक हो जाता है। क्योंकि एक तानाशाही शासन व्यवस्था भी संविधान के नियमों के अनुरूप चल सकती है जहाँ संविधान का सरोकार जनता के हितों, आकांक्षाओं व आदर्शो के बजाय स्वंय तानाशाह के हितों व आदर्शो को पोषक करने वाली होती है। इस तरह संविधानवाद लोकतंत्र की भावना के निकट है। संविधानवाद स्वंय लोकतांत्रिक मूल्यों की गारंटी सुनिश्चित करने वाली व शासन को लोकतंत्र की भावना के अनुरूप चलाने वाली जनता के राजनीतिक आकांक्षाओं और आदर्शों को पूरा करने वाली व्यवस्था है।

             बाबा साहेब भारत में पहले सिद्धान्तवादी थे। जिन्होंने यह माना था कि यदि राज्य अधिकारों को कायम रखने के लिए कटिबद्ध है तो उसे चाहिए कि वह सुविधावंचितों के लिए राज्य के सवैंधानिक आधार विचार करे। उन्होंने सुविधावंचित लोगों की निर्धारित करने के लिए निश्चित मानदण्ड का विकास किया। उन्होंने सामाजिक रूप से जन्म से उत्पन्न प्रतिकूल अवस्थाओं पर प्रकाश डाला क्योंकि वे प्रकृतिक और वंशागत प्रतिकूल अवस्थाओं  से अनभिज्ञ थे, परन्तु उन्होंने जब अनुभव किया कि सार्वजनिक प्रतिकूल अवस्थाएँ प्रभावशाली सामाजिक सम्बन्धों से ही कायम होगा। ये सामाजिक सम्बन्ध स्वाभाविक प्रतिकूल दशाओं में बदलने का प्रयास करते है। वे अपनी पीछे सामान्य रूप से वंचित समूहों के लिए और विशेष रूप से अछूतों के लिए सुरक्षा उपाय की व्यवस्था छोड़ गए उसमें उनकी चिंताओं में जाति -पात, समूह, धर्म शामिल था इस पर उन्होंने विरोध जताते हुए कहा कि कोई जाति या समूह नही है वे इस मौके पर बन रहे मुकम्मल राष्ट्र के पहले प्रवक्ता के तौर पर बोले कि - यह संविधानवादी अम्बेडकर है, जो स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व के वैश्विक सिंद्धांत पर मन, वचन और कर्म से विश्वास करते है।

       एक अखण्ड राष्ट्र की परिभाषा बाबा साहेब फ्रांस के दार्शनिक अर्न्स्ट रेनन से लेते है, रेनन नहीं मानते कि एक नस्ल, जाति, भाषा, धर्म, भूगोल या साझा स्वार्थ किसी जनसमुदाय को राष्ट्र बना सकता है। इसी आधार पर बाबा साहेब ने एक पवित्र राष्ट्र का विचार है, जिसमें हर सदस्य का साझा है। इसलिए संविधान सभा के आख़िरी भाषण में बाबा साहेब ने आर्थिक और सामाजिक गैर बराबरी के खात्मे को राष्ट्रीय एजेंडे के रूप सामने लाते है। उनकी कामना थी संवैधानिक संस्थाएं वंचित लोगो को लिए अवसरों का रास्ता खोलती है जो लोकतंत्र की हिस्सेदारी होती है राष्ट्रीय एकता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसलिए संविधान के मूल अधिकारों के अध्याय में अवसरों की समानता के सिद्धांत को स्वीकार करते हुए भी विशेष अधिकार का प्रावधान किया गया है जहाँ से आरक्षण का सिद्धांत भी पनपता है। भारत करोड़ो की आबादी वाले में वंचित जाति समूहों के हर सदस्य को नौकरी देने के लिए नही है बल्कि इसका मकसद यह है कि वंचित जातियों को महसूस हो सके कि देश में मौजूद अवसरों में उनका भी हिस्सा और देश चलाने में उनका भी योगदान है। इसलिए संविधान में अल्पसंख्यको, आदिवासियों, महिलाओं सबका रखता हुआ नजर आता है। बाबा साहेब ने 22 दिसम्बर 1952 में हुए पूना में वकीलों की एक सभा मे बोलते हुए कहा था कि - लोकतंत्र शासन की वह पद्धति है जिसमें लोगो के सामाजिक और आर्थिक जीवन मे बदलाव बैगर खूनखराबे के सम्भव है। उनका यह था विचार यदि देश मे लोकतंत्र कायम हो जाएगी तो उसे तीन बातों को हमेशा ध्यान रखना जरूरी होगा। जो यह कि हमें सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए केवल संविधानिक विधि का सहारा लेना चाहिए। इसमें कोई ढील नही देनी चाहिए इसका अर्थ यह भी था कि गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह का जो रास्ता दिखाया था, वह सही रास्ता नही था बाबा साहेब के अनुसार इसका अनुशरण हमें तब करना चाहिए जब सामाजिक और आर्थिक मकसद की पूर्ति के अन्य सब रास्ते बंद हो चुके हो वरना ये विधियां समाज को शान्ति के बजाय अराजकता के गर्त में धकेल देगी। दूसरी बात हमें अपनी स्वतन्त्रता को महापुरुषों के चरणों मे अर्पित नहीं कर देना चाहिए कोई इंसान किसी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए आत्मा सम्मान को दांव पर नहीं लगा सकता, कोई स्त्री किसी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए अपने सतीत्व को दांव पर नही लगा सकती बाबा साहेब ने भारत में  लोकतंत्र की दुदर्शा का कारण यह नही था कि यहाँ के मतदाता निरक्षर थे इसका असली कारण यह था कि यहाँ के नेतृत्व मतदाताओं को पालतू पशुओं की तरह हाँकने में विश्वास करता था। उसे विधि के शासन और लोकतंत्रीय प्रक्रिया में कोई अभिरुचि नही थी।

         लोकतंत्र व संविधानवाद पर डॉ0 अम्बेडकर के विचारों की उपयुक्त विवेचना से यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र के प्रति उनकी आस्था इस विश्वास पर आधारित था कि लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली व संविधानवाद के आधार पर ही भारत मे शांत सामाजिक, आर्थिक क्रांति सम्भव है। लोकतंत्र के समावेशी चरित्र पर उनका बल इस बात का प्रभाव है कि अल्पमत को बहुमत से घबराने की कोई आवश्यता नही है क्योंकि अल्पमत के सुरक्षा की भावना ही लोकतंत्र का आधार स्तम्भ है। बहुमत को सदैव अल्पमत के दृष्टिकोण का सम्मान करना चाहिए। संसदीय लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि समाज मे सामाजिक आर्थिक विषमताएं अधिक चौडी न हो जिसमें किसी तरह के भेद - भाव  की कोई गुजाइंश न हो और यदि ऐसा नही होता है तो सामाजिक, आर्थिक दरार खूनी क्रांति को जन्म दे सकती है। लोकतंत्र के सफल संचालन के लिए डॉ0 भीमराव अम्बेडकर ने इस बात पर बल दिया कि शासन संचालन किसी के सनक पर आधारित नही होना चाहिए अपितु यह संविधान के प्रावधान और संविधानवाद की भावना के अनुरूप होना चाहिये। वर्तमान सन्दर्भ में बाबा साहेब के उपयुक्त विचारों का महत्व स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं आज पहले से कही अधिक दबावों का सामना कर रही है। ऐसे में बाबा साहेब के उपयुक्त विचार सामान्य जनों के साथ ही शासन के लिए भी मार्गदर्शी सिंद्धान्तों के रूप में उभर कर सामने आते है।

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